Monday, July 20, 2020

Sectors of indian economy : भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र और जीडीपी में योगदान

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र (Sectors Of Indian Economy) :

दोस्तों भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही बड़ी अर्थव्यवस्था है, और विश्व की टॉप 10 अर्थव्यवस्थाओं में से एक है इसीलिए यह जानना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसके अलग-अलग क्षेत्रों के बारे, की क्या योगदान है उन क्षेत्रों का हमारी अर्थव्यवस्था में। इसलिए आज हम अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के बारे में जानकारी लेने वाले हैं। कोई भी अर्थव्यवस्था विभिन्न क्षेत्रों से बनी होती है। अर्थव्यवस्था के ऐसे क्षेत्रों को दो आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है।

A. व्यवसाय के अनुसार अर्थव्यवस्था के क्षेत्र:

निम्नलिखित व्यवसाय पर आधारित अर्थव्यवस्था के क्षेत्र के पाँच प्रकार (मुख्यतः तीन ही प्रकार है लेकिन कई पुस्तकों में इन्हें पांच प्रकारो में बांटा हैं) पाए जाते हैं। :

1. प्राथमिक क्षेत्र(Primary Sector) :

प्राथमिक क्षेत्र का मतलब है, ऐसे कार्य जो प्राकृतिक रूप से जुड़े हुए हैं, और पहले पायदान पर आते हैं। मुख्य रूप से जो भारतीय अर्थव्यवस्था है उसका बहुत बड़ा भाग प्राथमिक क्षेत्र में कार्य करता है। इस क्षेत्र में कृषि और कृषि से संबंधित व्यवसाय (पशुपालन, मत्स्य पालन, रेशम उत्पादन), वन संसाधन, खनन और खनिज उत्पादों (कोयला, पेट्रोलियम, लौह अयस्क, आदि का खनन) से संबंधित प्राकृतिक संसाधनों गतिविधियां शामिल हैं। प्राथमिक क्षेत्र को 'कृषि और संबद्ध क्षेत्र' के रूप से भी जाना जाता है।

2. द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector):

द्वितीयक क्षेत्र में ऐसे क्रियाकलाप आएंगे जो कृषि पर आधारित हो, या फिर वस्तुओं के निर्माण को हम द्वितीय क्षेत्र में रखते हैं। इस क्षेत्र को 'औद्योगिक क्षेत्र' के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यह प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त उत्पादों को संसाधित करके अन्य प्रकार के माल का उत्पादन करता हैं। इस क्षेत्र में विनिर्माण, निर्माण, बिजली उत्पादन, जल आपूर्ति आदि जैसे उद्योग शामिल हैं। 

3. तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector) :

तृतीयक क्षेत्र में हम द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र में जो सेवा प्रदान करने की जरूरत होती है, उसको रखते हैं। तृतीयक क्षेत्र और द्वितीयक क्षेत्र दोनों ही प्राथमिक क्षेत्र पर निर्भर है। तृतीयक क्षेत्र यह तो बना ही है प्राथमिक और द्वितीयक के लिए। इस क्षेत्र में विभिन्न सेवाएं शामिल हैं जो प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रों के पूरक हैं, इसलिए इस क्षेत्र को 'सेवा क्षेत्र' भी कहा जाता है। वर्तमान में तृतीयक क्षेत्र सबसे तीव्र गति से विकास करने वाला है क्षेत्र हैं।

4. चतुर्थ क्षेत्र (Quaternary Sector) :

इस क्षेत्र में ऐसे व्यवसाय शामिल हैं जिनमें उच्च बौद्धिक क्षमता का उपयोग किया जाता है। इस तरह के व्यवसाय उच्च ज्ञान से संबंधित हैं और अवधारणाओं के निर्माण, अनुसंधान और विकास से संबंधित हैं।
उदा:अनुसंधान और विकास, आईटी सॉफ्टवेयर विकास

5. पंचक क्षेत्र :

कुछ विशेषज्ञ पंचक क्षेत्र को चतुर्थक क्षेत्र का ही हिस्सा मानते हैं। पंचक क्षेत्रों में समाज और अर्थव्यवस्था के उच्चतम स्तरों पर निर्णय लेने की प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिनमें सरकार, विज्ञान, विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों, स्वास्थ्य सेवा, संस्कृति, मीडिया आदि के क्षेत्रों से उच्च-स्तरीय कार्यकारी निदेशक और अधिकारी शामिल हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के मुख्य तो तीन ही क्षेत्र माने जाते हैं, लेकिन कई पुस्तकों में अन्य दो क्षेत्र भी दिए हैं जो हमनें ऊपर देखें।

B.स्वामित्व के अनुसार अर्थव्यवस्था के क्षेत्र:

 1. सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) :

सभी सरकारी स्वामित्व वाले उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रण में हैं। सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम सरकार द्वारा चलाए जाते हैं।
उदाहरण के लिए, रेल्वे, हथियार, टेलीविजन, पेट्रोलियम

2. निजी क्षेत्र (Private Sector) :

निजी क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें उद्योगों और व्यवसायों को एक निजी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा स्वामित्व और नियंत्रित किया जाता है। व्यक्तिगत लाभ निजी क्षेत्र का मूल लक्ष्य है।
उदाहरण के लिए, कृषि और संबद्ध उद्योग, लघु उद्योग, थोक और खुदरा व्यापार, आदि।

3. संयुक्त क्षेत्र (Joint Sector) :

इस क्षेत्र के उद्योग और व्यवसाय संयुक्त रूप से सरकार के साथ-साथ निजी व्यक्तियों या समूहों के स्वामित्व, प्रबंधित और नियंत्रण में रहते हैं।

4. सहकारी क्षेत्र (Cooperative Sector) :

इस क्षेत्र में सहकारी आधार पर स्थापित संगठन / उद्योग शामिल हैं। सहकारी क्षेत्र को निजी क्षेत्र का एक उपप्रकार माना जाता है। सहकारी स्वामित्व निजी है लेकिन व्यक्तिगत के बजाय समूह की रहतीं हैं। सहकार पूंजीवाद और समाजवाद का स्वर्णिम माध्यम है। सहकारिता की ख़ासियत यह है कि सहकारी सदस्यों द्वारा लाए गए पूंजी की परवाह किए बिना 'एक सदस्य एक वोट' के सिद्धांत द्वारा शासित होते हैं।
तृतीय क्षेत्र के तीव्र गति से विकसित होने के कारण यानी कि ऐसा क्यों है कि तृतीयक क्षेत्र बहुत ही तीव्र गति से विकसित हो रहा:
जो उपरोक्त सेवाएं हैं उनकी जिम्मेदारी सरकार उठाती है यानी जो सारी चीजें हैं ना यहां पर यह सारी चीजों का जो जिम्मा है वह सरकार उठाती है। इसलिए इसमें रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं, क्योंकि कोई एक व्यक्ति नहीं कर रहा है यह बल्कि सरकार कर रही है। तो इसमें रोजगार का सृजन हो रहा है। दूसरी बात यह कि प्राथमिक और द्वितीयक दोनों क्षेत्रों के विकास से सेवा की मांग में वृद्धि होती है। 
आप निचे दिए उदाहरणों के अंतर्गत इस बात को बहुत ही साधारण तरीके से समझ सकते हैं। 
1. किसी किसान ने उत्पादन किया और उत्पादन आवश्यकता से अधिक हुआ तो वह किसान किसी को तो बेचेगा और बेचकर वह अपने भोग विलास की कोई वस्तु खरीदेगा। या नहीं भी खरीदेगा तो कहीं ना कहीं जाएगा आएगा उसमें वह अपने धन का उपयोग करेगा। 
2.व्दितीयक क्षेत्र में ऐसे मान लीजिए कि किसीने बहुत लंबे समय तक कार्य किया और करोड़ों रुपए कमाए अब वह क्या करेगा कि काम करने के बाद आराम करने की कोशिश करेगा। तो कुछ दिनों के लिए वह फैमिली के साथ या अकेला छुट्टी पर जा सकता है। वह होटल में जाएगा, अच्छी जगह घूमेगा इससे यह पता चलता है कि वह सेवा की डिमांड कर रहा है। 
3.आय बढ़ने के साथ लोग अन्य सेवाओं जैसे रेस्टोरेंट, पर्यटन, शॉपिंग, निजी अस्पताल, स्कूल एवं व्यवसायिक प्रशिक्षण इत्यादि में गुणवत्ता में सुधार की लोग मांग करते हैं और अधिक धन देने को तैयार हो जाते हैं। 
4.संचार और सूचना का विकास होने से सेवा क्षेत्र में बहुत विकास हुआ है  आज लोग घर बैठे टिकट बुक करा सकते हैं, टिकट आपके घर पर आ जाएंगे। आप घर बैठे खाना मंगवा सकते हैं। आप घर बैठे कुछ भी मंगवा सकते हैं। इन सभी कारणों की वजह से ही सेवा क्षेत्र बहुत तेजी से विकसित हो रहा है। 

जनसंख्या की संलग्नता (Population Engagement) :

हमारे देश की कितनी जनसंख्या किस किस भाग में कार्यरत है, या फिर किस क्षेत्र में सबसे अधिक कार्यरत हैं यह जानना बहुत जरूरी है। देश में 2007 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 72% लोग कृषि और उससे संबंधित क्रियाकलाप यानी पशुपालन और अन्य क्रियाकलापों से जुड़े हुए थे। वहीं पर 2017 के आंकड़ों के अनुसार लगभग 60% लोग कृषि और उससे संबंधित कार्य में लगे हुए थे। वहीं द्वितीयक क्षेत्र कि बात करें तो 2007 में लगभग 10% लोग इस क्षेत्र में लगे हुए थे। वहीं 2017 में द्वितीय क्षेत्र में इजाफा हुआ है, 7% इजाफा होकर यह संख्या 17% हो गई। तृतीयक क्षेत्र में 2007 में 18% लोग कार्य कर रहे थे। वहीं पर यह आंकड़ा 2017 में 22% के आसपास हो गया था। वर्तमान समय में यह आंकड़ा 30% से ऊपर चला गया हैं। तो इस प्रकार से आप तुलना करके देख सकते हैं कि किस प्रकार से प्राथमिक क्षेत्र से संक्रमण हो रहा है द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र में।

जीडीपी (GDP) में योगदान :

जीडीपी में किस क्षेत्र का कितना योगदान है?
प्राथमिक यानी कि कृषि और उसके संबंधित क्षेत्र का जीडीपी में एक चौथाई यानी कि 25% हिस्सा हैं। जबकि द्वितीयक और तृतीयक इन दोनों का 75% हिस्सा हैं।
प्राथमिक क्षेत्र में लोग ज्यादा जरूर काम कर रहे हैं लेकिन वहां पर आय उतनी नहीं है जितनी तृतीयक और द्वितीयक क्षेत्र में हैं। लोगों की जनसंख्या का बड़ा भाग प्रथम क्षेत्र में कार्यरत है परंतु जीडीपी में कुछ ज्यादा योगदान नहीं हैं। इसका मुख्य कारण यह भी है कि प्रच्छन्न बेरोजगारी यानी कि 60% लोग आज के समय में खेती में लगे हुए हैं फिर भी अर्थव्यवस्था में उनका जो योगदान है वह मात्र 25%। यह तो सोचने वाली बात है। यानी खेती बहुत पिछे चल रही है हमारी और सेवा क्षेत्र बहुत आगे निकल गया हैं।

Tuesday, July 14, 2020

Types Of Indian Economics and Economy (भारतीय अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था के प्रकार)

अर्थशास्त्र के प्रकार (Types of Economics) :

अर्थशास्त्र के अंतर्गत हम किसी भी क्षेत्र के अर्थव्यवस्था का अध्ययन करते हैं। यानी कि उसकी आर्थिक गतिविधियों के अंतर्गत आने वाले जो भी बातें हैं उन सब का अध्ययन ही अर्थशास्त्र विषय के अंतर्गत किया जाता है। अब इसको लेकर के एक बात आपके दिमाग में आएगी क्या इसके माध्यम से एक परिवार का अर्थशास्त्र भी देखा जा सकता है या केवल बड़े स्तर पर किसी देश का ही अर्थशास्त्र देखा जा सकता हैं। तो इसी को लेकर के अर्थशास्त्र को दो भागों में बांटा गया पहला समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) और दूसरा है सूक्ष्म अर्थशास्त्र (Microeconomics)।



समष्टि अर्थशास्त्र ( Macroeconomics) :

इस अर्थशास्त्र के अंतर्गत हम किसी बड़े क्षेत्र के यानी किसी देश या किसी राज्य या पूरे विश्व के अर्थशास्त्र का अध्ययन करते हैंं। इसमें अर्थशास्त्र के जीतने भाग हैं, जैसे गरीबी, बेरोजगारी, कृषि और उद्योग के सेक्टर का विकास सभी चीजों का बारीकी से अध्ययन किया जाता है। तो जब अर्थव्यवस्था के रूप बड़े हो यानी उसके बडे क्षेत्र के विषय में जानकारी इकट्ठा करने की बात आती है तो हम लोग उसे समष्टि अर्थशास्त्र कहतें हैं। जिसके अंतर्गत किसी देश या किसी राज्य की अर्थव्यवस्था को ज्ञात किया जाता हैं।

सूक्ष्म अर्थशास्त्र (Microeconomics) :

इस अर्थशास्त्र  के तहत किसी छोटे से फार्म या किसी छोटे से कंपनी या किसी परिवार के आय-व्यय से लेकर के उसके विभिन्न आर्थिक पक्षों का हम अध्ययन करते हैं तो उसे सूक्ष्म अर्थशास्त्र कहते हैं।
समष्टि अर्थशास्त्र यानी बेहद बड़े स्तर पर, बड़े क्षेत्र के अर्थव्यवस्था का अध्ययन करते हैं, तो सूक्ष्म अर्थशास्त्र के अंतर्गत किसी परिवार या किसी कंपनी या किसी फार्म के छोटे स्तर के अर्थव्यवस्था का अध्ययन करते हैं। 
इसके अलावा विश्व में कुछ प्रचलित अर्थव्यवस्था है, जिनको अलग-अलग नाम दिए गए हैं, जैसे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, मिश्रित अर्थव्यवस्था, समाजवादी अर्थव्यवस्था, खुली अर्थव्यवस्था, बंद अर्थव्यवस्था। तो यह अर्थव्यवस्था के बाकी प्रकार हैं जिन्हें अलग-अलग देशों ने अपनाया हैं।

अर्थव्यवस्था के प्रकार ( Types of economy) :

1.पूंजीवादी अर्थव्यवस्था (Capitalist Economy) :

इसमें क्या होता है कि सरकार का नियंत्रण अपने उत्पाद पर बहुत सीमित होता है और अधिकांश नियंत्रण जो है वह निजी क्षेत्र के हाथों में होता है,अर्थात ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें उत्पाद के साधन पर निजी स्वामित्व यानी प्राइवेटाइजेशन बहुत ज्यादा होता हैं। प्राइवेट क्षेत्र का अधिकार किसी क्षेत्र में बहुत ज्यादा हो तो वहां पर निजी स्वामित्व बढ़ता हैं। अर्थात राज्य का हस्तक्षेप सीमित हो जाता हैं। इसी वजह से इस अर्थव्यवस्था को नाम दिया जाता है पूंजीवादी अर्थव्यवस्था। 
उदाहरण के तौर पर देखें तो यूएसए, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे कई यूरोपीय देशों में जो है वह पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ही अपनाई गई हैं। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था आज विश्व के अधिकांश देशों में देखने को मिलती है। ऐसी अर्थव्यवस्था को उदारवादी अर्थव्यवस्था भी कहा जाता है, क्योंकि जिस में सरकार उदार रुख अपनाती है और निजीकरण को बढ़ावा देती है। तो आपने समझा कि जहां निजी क्षेत्रों का अधिकार अधिक हो और सरकार का स्वामित्व सीमित हो तो उसे पूंजीवादी अर्थव्यवस्था कहते हैं।

2.समाजवादी अर्थव्यवस्था(Socialist economy) :     

समाजवादी अर्थव्यवस्था क्या होती है? जितने भी उत्पादन और आय के साधन है उन साधनों पर सरकार का नियंत्रण होता है और निजी क्षेत्र का अधिकार बहुत सीमित होता है। तो ऐसे व्यवस्था को समाजवादी अर्थव्यवस्था कहते हैं। जैसे इस व्यवस्था में धन संपत्ति का स्वामित्व और वितरण सरकार के नियंत्रण में हो तो सरकार को कहीं बार समाज लिख कर के भी संबोधित किया जाता हैं। अर्थात पूरे शासन व्यवस्था पर राज्य कायस्थ समाज का नियंत्रण हो तो उस शासन व्यवस्था को हम लोग समाजवादी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत जानते हैं। उदाहरण के लिए सोवियत संघ (रूस) जो पहले था वह पूर्णता समाजवादी अर्थव्यवस्था अपनाने वाला देश था। लेकिन अब उन देशों में भी, जहां पर समाजवादी अर्थव्यवस्था थी वहां भी थोड़ा-थोड़ा निजीकरण बढ़ने लगा है। तो हम लोग इसे पूर्णता पूंजीवादी अर्थव्यवस्था तो नहीं कह सकते लेकिन आज भी यहां सोशलिस्ट इकोनामी पाई जाती है तो पूंजीवादी वादी में निजी क्षेत्रों का अधिकार और समाजवादी में जो बेसिक तौर पर जो सरकार है उसका अधिकार अधिक होता है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) :

जिस अर्थव्यवस्था में कैपिटल (पूंजीवाद) और सोशल (समाजवाद) इन दोनों के गुण पाए जाते हैं उसे मिश्रित अर्थव्यवस्था कहते हैं। (जैसे भारत) अर्थात निजी संस्थाओं का भी प्रतिनिधित्व हो और सरकार का भी अपना प्रतिनिधित्व हो। 
उदाहरण के तौर पर देखें तो भारत में टाटा(TATA) जैसी कंपनी है जो प्राइवेट है और सील(SEAL) जैसी संस्थाएं भी है जो भारत सरकार के नियंत्रण में काम करती हैै। यानी यहां
प्राइवेटाइजेशन भी है और सोशलिज्म के गुण भी है। 
इसके ऊपर कई बार परिक्षाओं में में सवाल भी पूछते हैं कि, ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें सार्वजनिक एवं निजी दोनों का सह अस्तित्व यानी दोनों साथ-साथ एग्जिट करते हो तो वैसे इकोनॉमी को हम लोग क्या कहते हैं?

भारतीय अर्थव्यवस्था मिश्रित अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आती है।


अर्थव्यवस्थाओं के अन्य कुछ प्रकार निम्न में दिए गए हैं-

खुली अर्थव्यवस्था (Open Economy) :

यह अर्थव्यवस्था पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का ही एक रूप है। यहां पर यह देखने को मिलता है कि जो उत्पादन है उस पर निजी प्रतिनिधि होते हैं और यहां आयात निर्यात खुलकर होता है। यहां पर सरकार आयात-निर्यात में हस्तक्षेप कम करते हैं और देश में आयात-निर्यात बड़े मात्रा में होते हैं। तो उस अर्थव्यवस्था को हम खुली अर्थव्यवस्था के नाम से जानते हैं। (उदाहरण- यूएसए, सिंगापुर, भारत). 

बंद अर्थव्यवस्था (Closed Economy) :

ऐसी अर्थव्यवस्था जहां पर निर्यात और आयात इन दोनों पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे तो उस अर्थव्यवस्था को बंद अर्थव्यवस्था यानी क्लोज्ड इकोनामी कहेंगे। अर्थात जहां ना आयात हो ना ही निर्यात हो ऐसे अगर स्थिति में देखे तो उत्तर कोरिया को कुछ संदर्भों में इस श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि उत्तर कोरिया पूर्णता व्यापार नहीं करते हैं, वह करते हैं लेकिन सीमित देशों के साथ ही उनका व्यापारिक संबंध है। ऐसे में कुछ सीमित संदर्भों के साथ यह कहा जा सकता है कि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था को हम बंद अर्थव्यवस्था के तहत रख सकते हैं। लेकिन वर्तमान की दुनिया ऐसी है जहां किसी भी देश को पूर्णता आयात-निर्यात से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है या ना ही वह देश अपने आप को जानबूझकर प्रतिबंधित कर सकेगा। 
तो यहां तक हमने अर्थशास्त्र के कुछ बेसिक टर्म देखें कि कैसे इकोनामी को विभिन्न रूपों में बांटा गया है। 

इसके बाद हम लोग थोड़ा सा आते हैं अर्थशास्त्र की परिभाषा और उनसे जुड़े हुए कुछ महत्वपूर्ण बातों कि तरफ। 


अर्थशास्त्र की परिभाषा और महत्वपूर्ण अर्थशास्त्र विद्वान :

अर्थशास्त्र की जो परिभाषा बहुत सारे विद्वानों द्वारा दी गई है। उस के संदर्भ में तो सबसे पहले 'अर्थशास्त्र' नामक पुस्तक की रचना जो है वह चाणक्य द्वारा की गई जिन्हें कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। आपको इतिहास में पढ़ने को मिला होगा कि अर्थशास्त्र के लेखक जो चाणक्य थे वह चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु थे और अपने शासनकाल में उन्होंने अर्थशास्त्र की रचना की थी। अर्थशास्त्र वास्तव में एक ऐसी पुस्तक थी जिसका उद्देश्य राजनीति विज्ञान से था। अर्थात राजा को किस प्रकार से शासन करना चाहिए, अपने जनता का किस प्रकार से ख्याल रखना चाहिए इस संबंध में इसमें विवरण किया गया है। इसमें साप्ताहिक सिध्दांत  का वर्णन भी किया गया है। अर्थात यह अर्थशास्त्र नाम से पुस्तक तो जरूर रची गई लेकिन इसका विषय राजनीति शास्त्र से जुड़ा हुआ था। तो कई बार परिक्षाओं में यही पूछा जाता है कि चाणक्य की अर्थशास्त्र नामक पुस्तक किस विषय पर लिखी गई थी? तो राजनीति शास्त्र के विषय पर लिखी गई थी ना कि अर्थशास्त्र पर, तो इसे आप याद रखेंगे। 
एडम स्मिथ अॅडम स्मिथ के बारे में कई बार आपने पढ़ा भी होगा की इन्हें 'अर्थशास्त्र के जनक' के रुप से जाना जाता है। उन्होंने 1776 में लिखी अपनी पुस्तक 'वेल्थ ऑफ नेशंस' में कहा कि धन का विज्ञान ही अर्थशास्त्र है। अर्थात धन के विज्ञान के रूप में एडम स्मिथ ने अर्थव्यवस्था का विवरण किया। 
अर्थशास्त्र को लेकर के कुछ अन्य विद्वानों ने भी अपने-अपने बातें कहीं, अपने-अपने पुस्तकों में लिखीं जैसे कार्ल मार्क्स जिनकी पुस्तक है 'दास कैपिटल'। 1867 में दास कैपिटल प्रकाशित हुई थी और उन्होंने भी अर्थशास्त्र के ऊपर कुछ बातें कहीं। उन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र का उद्देश्य मानव समाज की प्रगति के नियम की खोज करना है।                             
जहां एक तरफ अर्थशास्त्र में प्रारंभिक जो विद्वान थे वह यह मानते थे कि अर्थशास्त्र का मूल उद्देश्य केवल पैसे कमाना है। वही बाद में कुछ ऐसी विचारधारा के लोग भी आये जिन्होंने कहा कि अर्थशास्त्र का मूल उद्देश्य सिर्फ पैसे से पैसे कमाना नहीं है बल्कि अर्थशास्त्र के माध्यम से समाज का कल्याण करना इसका मूल उद्देश्य है। जैसा कि आपने जाना भी होगा कि भारतीय अमर्त्य सेन जी को लोक कल्याणकारी क्षेत्र में कार्य करने के लिए ही अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। तो इसका मतलब यही है कि अर्थशास्त्र केवल धन का विज्ञान नहीं है बल्कि यह मानव कल्याण का भी विज्ञान है। अर्थशास्त्र की विज्ञान संबंधी परिभाषा के लिए अगर किसी को जाना जाता है तो वह है रॉबिंसन, उन्होंने कहा था कि अर्थशास्त्र वास्तविक विज्ञान है। कुछ अन्य अर्थशास्त्र के विद्वानों ने भी अपने-अपने पुस्तकों में लिखा है। 

अर्थशास्त्र के कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें और उनके लेखक :

1.वेल्थ ऑफ नेशन - अॅडम स्मिथ 
2.नेचर ऑफ सिग्निफिकेंट ऑफ इकोनॉमिक साइंस- रॉबिंसन
3.प्रिंसिपल्स ऑफ़ इकोनॉमिक्स - मार्शल 
4.फाउंडेशन ऑफ इकोनामिक एनालिसिस - सैमूल