सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilisation) :
हम लोगों को पता है कि विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक सिंधु घाटी सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता है। इस सभ्यता के जानकारी से पहले वैदिक सभ्यता को ही हम सबसे प्राचीन सभ्यता के रूप में मानते थे। नतीजा ये हुआ कि ब्रिटिश काल में इसे विभिन्न स्तरों पर खोजने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई और जब इस सभ्यता का पता चला तो यह ज्ञात हुआ कि यह भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता है। ना केवल यह भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता है बल्कि विश्व की प्राचीन चार महत्वपूर्ण सभ्यताओं में से एक है जिसमें हम लोग नील नदी की सभ्यता जिसे मिस्र की सभ्यता के नाम से जाना जाता है, मेसोपोटामिया की सभ्यता, चीन की सभ्यता और भारत की सभ्यता जिसे हम लोग सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से भी जानते हैं।सिंधु सभ्यता की खोज :
ब्रिटिश काल के एक व्यक्ति जिनका नाम था चार्ल्स मैसन, इन्होंने पाकिस्तान (तब यह जगह भारत में थी) क्षेत्र का दौरा किया और हड़प्पा क्षेत्र के संबंध में इन्हें कुछ जानकारी मिली। उन्होंने यह अनुमान लगाया कि इस क्षेत्र में कोई सभ्यता है, यह घटना 1826 की है। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया था कि यहां पर कोई सभ्यता है। उन्होंने एक पत्रिका निकाली थी जिसका नाम था 'नैरेटिव ऑफ जर्नीज' और इसी पत्रिका में उन्होंने इसके विषय में जानकारी पहली बार व्यक्त की थी जो धीरे-धीरे फैलनी शुरू हो गई।
इसके बाद की एक घटना है बर्टन बंधुओं के संबंध में। 1856 के आसपास में पाकिस्तान के दो क्षेत्र कराची और लाहौर के बीच रेलवे लाइन बन रही थी। इस रेलवे लाइन के निर्माण के क्रम में दो इंजीनियर थे, वे दोनों भाई थे और इनका नाम था बर्टन बंधु, एक का नाम था जेम्स बर्टन और दूसरे का नाम था विलियम बर्टन। तो जेम्स बर्टन और विलियम बर्टन के नेतृत्व में जब रेलवे की पटरी बनाने का काम हो रहा था इस दौरान उन्हें वहा के टीलों से इटे प्राप्त होनी शुरू हुई। इन ईटों को इन्होंने बड़ी आसानी से प्राप्त करके पटरीओं पर बिछाने के क्रम में लगा दिए। नतीजा यह निकला कि उस समय उन्हें ज्ञात हुआ कि यहां कोई पुराने घर रहे होंगे। लेकिन यह किसी सभ्यता का अंग है यह इनको भी पता नहीं चला और इस संबंध में उन्होंने ज्यादा शोध करने का प्रयास नहीं किया।
पहली बार यहां अगर किसी ने शोध करने का प्रयास किया तो वे थे अलेक्जेंडर कनिंघम। 1853 से 1856 के बीच में इन्होंने कई बार इस हडप्पा क्षेत्र का दौरा किया और इस क्षेत्र में जाकर के इसके संबंध में जानकारी इकट्ठा करने का प्रयास किया। लेकिन यह भी उतने सफल नहीं हो सके जितनी सफलता की आवश्यकता थी अर्थात यह पूरी तरह से व्यवस्थित रूप से इस सभ्यता के बारे में जानकारी नहीं दे सके।
सर जॉन मार्शल 1921 में भारत के पुरातात्विक विभाग के हेड थे और इन्हीं के नेतृत्व में इस क्षेत्र में खुदाई का कार्य प्रारंभ हुआ। खुदाई करने वाले दो भारतीय नेतृत्व करता थे जिनका नाम था दयाराम साहनी और दूसरे थे राखलदास बनर्जी। दयाराम साहनी के नेतृत्व में हड़प्पा और राखलदास बनर्जी के नेतृत्व में मोहनजोदड़ो की खोज की गई। इस तरह से इन्हें ही सर्वाधिक प्रारंभिक खोज कर्ताओं का श्रेय दिया जाता है।
इसके बाद की एक घटना है बर्टन बंधुओं के संबंध में। 1856 के आसपास में पाकिस्तान के दो क्षेत्र कराची और लाहौर के बीच रेलवे लाइन बन रही थी। इस रेलवे लाइन के निर्माण के क्रम में दो इंजीनियर थे, वे दोनों भाई थे और इनका नाम था बर्टन बंधु, एक का नाम था जेम्स बर्टन और दूसरे का नाम था विलियम बर्टन। तो जेम्स बर्टन और विलियम बर्टन के नेतृत्व में जब रेलवे की पटरी बनाने का काम हो रहा था इस दौरान उन्हें वहा के टीलों से इटे प्राप्त होनी शुरू हुई। इन ईटों को इन्होंने बड़ी आसानी से प्राप्त करके पटरीओं पर बिछाने के क्रम में लगा दिए। नतीजा यह निकला कि उस समय उन्हें ज्ञात हुआ कि यहां कोई पुराने घर रहे होंगे। लेकिन यह किसी सभ्यता का अंग है यह इनको भी पता नहीं चला और इस संबंध में उन्होंने ज्यादा शोध करने का प्रयास नहीं किया।
पहली बार यहां अगर किसी ने शोध करने का प्रयास किया तो वे थे अलेक्जेंडर कनिंघम। 1853 से 1856 के बीच में इन्होंने कई बार इस हडप्पा क्षेत्र का दौरा किया और इस क्षेत्र में जाकर के इसके संबंध में जानकारी इकट्ठा करने का प्रयास किया। लेकिन यह भी उतने सफल नहीं हो सके जितनी सफलता की आवश्यकता थी अर्थात यह पूरी तरह से व्यवस्थित रूप से इस सभ्यता के बारे में जानकारी नहीं दे सके।
सर जॉन मार्शल 1921 में भारत के पुरातात्विक विभाग के हेड थे और इन्हीं के नेतृत्व में इस क्षेत्र में खुदाई का कार्य प्रारंभ हुआ। खुदाई करने वाले दो भारतीय नेतृत्व करता थे जिनका नाम था दयाराम साहनी और दूसरे थे राखलदास बनर्जी। दयाराम साहनी के नेतृत्व में हड़प्पा और राखलदास बनर्जी के नेतृत्व में मोहनजोदड़ो की खोज की गई। इस तरह से इन्हें ही सर्वाधिक प्रारंभिक खोज कर्ताओं का श्रेय दिया जाता है।
सिंधु सभ्यता का तिथि निर्धारण :
सिंधु घाटी सभ्यता के संबंध में जितनी भी जानकारियां प्राप्त हुई है वह मुक्त पुरातात्विक स्रोतों पर आधारित है। किसी भी प्रकार के लिखित स्रोत को यहां पढ़ा नहीं जा सका है। परिणाम स्वरुप अलग-अलग जो खोजकर्ता थे जैसे सर जॉन मार्शल, डीपी अग्रवाल, चाइल्ड, इन सभी ने अपने-अपने अनुसार इस तिथि को क्रम देना शुरू किया।
सबसे पहला तिथि क्रम सर जॉन मार्शल ने दिया क्योंकि यह इस पूरे विभाग के नेतृत्वकर्ता थे। उन्होंने कहा कि 3250 BC से 2750 BC तक सिंधु घाटी सभ्यता का काल रहा हैं।
लेकिन आपको पता होना चाहिए कि एक पद्धति है कार्बन 14 पद्धति जिसके माध्यम से किसी जीवाश्म की आयु ज्ञात की जाती है। और इसी माध्यम द्वारा जब आयु निकाला गया तो इसे माना गया 2300 BC से 1750 BC और इस पध्दति का सबसे पहले समर्थन भारतीय पुरातत्ववेता डीपी अग्रवाल ने किया था। हालांकि अलग-अलग विद्वानों ने इसके संबंध में अलग-अलग विचार दिए हैं। लेकिन अंतिमतः 2500 से 1700 साल के बीच इस का काल को मुख्य रूप से माना गया। यह एक पैमाना बना जहां ज्यादातर इतिहासकार आपस में सहमत दिखाई देते हैं नहीं तो वैसे इसके काल के संबंध में सभी इतिहासकारों में मतभेद दिखाई देते है।
सबसे पहला तिथि क्रम सर जॉन मार्शल ने दिया क्योंकि यह इस पूरे विभाग के नेतृत्वकर्ता थे। उन्होंने कहा कि 3250 BC से 2750 BC तक सिंधु घाटी सभ्यता का काल रहा हैं।
लेकिन आपको पता होना चाहिए कि एक पद्धति है कार्बन 14 पद्धति जिसके माध्यम से किसी जीवाश्म की आयु ज्ञात की जाती है। और इसी माध्यम द्वारा जब आयु निकाला गया तो इसे माना गया 2300 BC से 1750 BC और इस पध्दति का सबसे पहले समर्थन भारतीय पुरातत्ववेता डीपी अग्रवाल ने किया था। हालांकि अलग-अलग विद्वानों ने इसके संबंध में अलग-अलग विचार दिए हैं। लेकिन अंतिमतः 2500 से 1700 साल के बीच इस का काल को मुख्य रूप से माना गया। यह एक पैमाना बना जहां ज्यादातर इतिहासकार आपस में सहमत दिखाई देते हैं नहीं तो वैसे इसके काल के संबंध में सभी इतिहासकारों में मतभेद दिखाई देते है।
सिंधु घाटी सभ्यता ऐसा नाम क्यों देना पडा?
प्रारंभ में जितने स्थल खोजे जा रहे थे वह मूल रूप से सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे पाए जा रहे थे। शुरू से एक परंपरा विकसित रही थी कि नील नदी की सभ्यता, ह्वांगहो नदी की सभ्यता तू ऐसा ही माना गया कि भारत में भी यह सभ्यता जो है सिंधु नदी के किनारे ही हैं, इसीलिए इसे यह नाम दे दिया गया। लेकिन बाद में चलकर के ऐसा पाया गया कि यह केवल सिंधु नहीं बल्कि सरस्वती नदी के किनारे भी है, फिर परिणाम स्वरूप से सिंधु एवं सरस्वती की सभ्यता नाम दिया गया। हालांकि यह नाम कुछ इतिहासकारों के बीच ही प्रचलित रहे और पुस्तकों वगैरह में इसे बहुत कम ही जगह दी जाती है।हड़प्पा सभ्यता :
इतिहास में एक संस्कृति रहीं हैं कि यदि किसी सभ्यता के नामाकरण में किसी प्रकार की समस्या उत्पन्न होती है, तो उस सभ्यता का नामाकारण उस स्थल के नाम पर किया जाएगा जिस स्थल की खुदाई सबसे पहले हूई थी। तो हमने यहां पड़ा था कि 1921 में दयाराम साहनी जी के नेतृत्व में सबसे पहला खोजा गया स्थल हडप्पा था। वर्तमान में यह पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में है और यह हड़प्पा सिंधु घाटी सभ्यता का पहला स्थल था।सिंधु सभ्यता के निर्माता कौन थे?
जैसे हम लोग पढ़ते हैं कि वैदिक सभ्यता के निर्माता आर्य रहे थे उसी तरह से यह खोजने का प्रयत्न किया गया कि सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता कौन थे। इस संबंध में जब समस्या आनी शुरू हुई तो, जो विदेशी इतिहासकार उन्होंने विदेशी मत को प्रधानता दी। ज्यादातर भारतीय इतिहासकारों ने और कुछ विदेशी इतिहासकारों ने भी यह माना कि नहीं, सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता भारतीय थे। विदेशी मतवालों ने अपने तर्क रखे कि जिस प्रकार के घर सुमेरिया में पाए जाते हैं उसी प्रकार के घर सिंधु घाटी सभ्यता में पाए जाते हैं। वह भी मोहरों का उपयोग करते थे तो यह भी मोहरों का उपयौग करते थे, और उनकी धार्मिक परंपराएं भारत से मिलती जुलती थी। लेकिन जब स्थानीय मत की बात आई तो उन्होंने भी अपने तर्क रखें कि नहीं दोनों में समान घर जरूर पाए जाते हैं लेकिन नालियों की व्यवस्था अलग अलग थी। दोनों में ईटों के आकार अलग अलग थे, दोनों में मोहरों कि गुणवत्ता अलग-अलग थी। स्थानीय मत को इन्होंने सिद्ध करने का प्रयास किया। राखल दास बनर्जी ने यह तर्क दिया कि सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता कोई और नहीं बल्कि द्रविड़ जाति के लोग थे। इसके अलावा टी. एन. रामचंद्र और लक्ष्मण स्वरूप पुसालकर ने कहा कि नहीं इसके निर्माता आर्य थे हालांकि इस विचार को बहुत कम तवज्जो दी जाती है इसका कारण यह है कि वैदिक सभ्यता के निर्माता आर्य रहे हैं और उनका काल बिल्कुल भी सिंधु घाटी के काल से समान नहीं है। उन्हें ईटों के घर में रहने की जानकारी थी तो फिर वो वैदिक काल में आकर के झोपड़ी में क्यों रहते हैं। तो इसको तो कम ही मत दिया जाता है। सबसे ज्यादा मत इसी को दिया जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता कौन थे, तो द्रविड़ थे।सिंधु सभ्यता की विशेषताएं :
1) विशेष नगरीय सभ्यता :
भारत की पहली नगरीय सभ्यता यानी, नगरों का जन्म भारत में अगर कभी होता है तो सिंधु घाटी सभ्यता के रूप में होता है और यहीं से सबसे पहले नगरीय स्वरूप का विकास प्रारंभ हो जाता है। नगर की जितनी विशेषताएं थी जैसे पक्के के घर होना, सडके चौड़ी होना, नालियों की व्यवस्था होनी चाहिए इस तरह की सारी सुख सुविधाएं इस सभ्यता में मौजूद थे। मुख्यता जो नगर जो कि व्यापार प्रधान हुआ करते थे वह इस सभ्यता में मौजूद थे।
2) कांस्य युगीन सभ्यता :
जैसे जिस काल में तांबा का उपयोग हुआ तो हम ताम्र युगीन सभ्यता कहते हैं। उसी तरह जिस काल में पत्थर का उपयोग हुआ उस काल को पाषाण सभ्यता कहते हैं। जिस काल में लोहे का ज्यादा उपयोग हुआ उसे लोहा युगीन सभ्यता के रूप में जानते हैं। उसी तरह से सिंधु घाटी सभ्यता में कांस्य का बहुत ज्यादा उपयोग हुआ यही कारण है कि इसे कांस्य युगीन सभ्यता कहा जाता है।3) आद्य ऐतिहासिक सभ्यता :
आद्य ऐतिहासिक सभ्यता मतलब ऐसी सभ्यता जिसकी लिखित जानकारी मिली है लेकिन उसे पढ़ा नहीं जा सका। इतिहास में तीन प्रकार के शब्दों के उपयोग किए जाते हैं। एक है प्रागैतिहासिक सभ्यता, दूसरा है आद्यऐतिहासिक सभ्यता और तिसरा है इतिहास। प्रागैतिहासिक सभ्यता में वह सभ्यताएं होती है जिनके विषय में ना तो लिखित जानकारी मिली है और ना ही लिखी जानकारी को पढ़ा जा सकता है। जैसे पाषाण काल वह प्रागैतिहासिक काल के अंतर्गत आता हैं। आद्यऐतिहासिक काल में वैसी सभ्यताएं आती है जिनसे लिखित जानकारी मिली है लेकिन उसे पढ़ा नहीं जा सका। तो सिंधु घाटी सभ्यता आद्य ऐतिहासिक सभ्यता है और यहां से जो लिपि मिली थी वह चित्र लिपि थी। कुछ लिपी चित्र के माध्यम से बनाए गए थे और उसे आज भी पढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन अभी तक इतिहासकार इसमें सफल नहीं हो पाए हैं। जैसे ही उन लिखित स्रोतों को पढ़ लिया जाएगा तो उसे नाम दे दिया जाएगा इतिहास।3) शांतिप्रिय सभ्यता :
यह एक बहुत बड़ी विशेषता है, ज्यादातर प्राचीन सभ्यताओं में हम लोग यह देखते हैं कि युद्ध एक मुख्य आधार था। किसी भी विषय पर चाहे वह जैसे धार्मिक, राजनीतिक विषय हो उसके लिए युद्ध लड़े जाते थे लेकिन सिंधु घाटी सभ्यता में एक विशेष गुण यह देखने को मिलता है कि इस दौरान लोग शांतिप्रिय थे। यहां किसी भी प्रकार के युद्ध के संबंध में जानकारी नहीं मिलती है। खुदाई के दौरान किसी भी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र नहीं मिले हैं जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह लोग शांतिप्रिय थे और शांतिपूर्ण रहते थे और एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था को संचालित करते थे।4) व्यापार प्रधान सभ्यता :
जितनी भी प्राचीन सभ्यताएं रही है वह ज्यादातर कृषि प्रधान रही। कृषि को विशेष प्रोत्साहन दिया जाता था। कृषि पर ही पूरी सभ्यता टिकी होती थी। जैसे हम लोग वैदिक काल में आकर पढ़ेंगे तो पशुपालन और कृषि ज्यादा प्रमुख थे। इस काल में व्यापार को बहुत प्रधानता दी गई क्योंकि आज भी अगर हम ध्यान दें तो शहरे क्या है, व्यापारिक केंद्र होती है। शहरों में कृषि कार्य नहीं होते हैं, शहरों मूल रुप से व्यापार होते हैं। उसी तरह से सिंधु घाटी सभ्यता के काल में भी शहरे जो थी वह अत्यधिक प्रसिद्ध थी और शहरी व्यापार का एक प्रमुख केंद्र थे। वहां से व्यापार संचालित होते थे और यही कारण है कि सिंधु घाटी सभ्यता को एक व्यापार प्रधान सभ्यता के रूप में देखा जाता है।5) विस्तृत सभ्यता :
इस सभ्यता का विस्तार बहुत बड़े क्षेत्र में था। जितनी बड़ी सभ्यता मिस्त्र और नील मिलाकर नहीं थी उससे कई गुना ज्यादा बड़ी सभ्यता थी हमारी सिंधु घाटी सभ्यता।
इसके अलावा विभिन्न आधारों को भी हम लोग विशेषता के रूप में पढ सकते हैं जैसे इस समय के राजनीतिक व्यवस्था कैसे थे, आर्थिक व्यवस्था कैसे थे, सामाजिक और सांस्कृतिक कैसे थे।
राजनीतिक :
राजनीतिक में हम लोग विशेष रूप से देखते हैं कि राजनीति का स्वरूप कैसा था राजतंत्रात्मक था कि प्रजातंत्रत्मक था। अभी ही बताया कि इस पूरे सभ्यता के अध्ययन के लिए जो स्रोत उपलब्ध है वह मूल रुप से पुरातात्विक स्रोत है। नतीजन परिणाम यह निकलता है कि इस सभ्यता के संबंध में जो भी जानकारियां हमने इकट्ठा किए हैं वह सब किसी पुरातत्व को देखकर अनुमानित रूप से इकट्ठा किए हैं। तो राजनीतिक जीवन के संबंध में कैसी व्यवस्था थी इसके संबंध में इतिहासकारों में मतभेद है कुछ यह मानते हैं कि पुरोहित या व्यापारी वर्ग ही पूरे सभ्यता का संचालन करते थे। कुछ यह कहते हैं कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था थी।
आर्थिक :
आर्थिक में मूल रूप से हम लोगों को पढ़ना है कि कैसे किसी कार्य को शुरू करना पड़ता था। पशुपालन में कौन से पशु थे, यह सारी चीजें आर्थिक क्रिया का प्रमुख अंग बन जाते हैं। व्यापार आर्थिक क्रियाओं का मुख्य अंग था। यहां दोनों व्यापार थे, जैसे की देश के अंदर भी और देश के बाहर भी। तो यह आर्थिक क्रिया का अंग बन जाते हैं।
आर्थिक में मूल रूप से हम लोगों को पढ़ना है कि कैसे किसी कार्य को शुरू करना पड़ता था। पशुपालन में कौन से पशु थे, यह सारी चीजें आर्थिक क्रिया का प्रमुख अंग बन जाते हैं। व्यापार आर्थिक क्रियाओं का मुख्य अंग था। यहां दोनों व्यापार थे, जैसे की देश के अंदर भी और देश के बाहर भी। तो यह आर्थिक क्रिया का अंग बन जाते हैं।
सामाजिक :
सामाजिक क्रिया में समाज कितने वर्गों में बांटा था? क्योंकि हम लोग वैदिक काल से पड़ेंगे तो हमें यह नजर आएगा कि, समाज चार वर्णो बंटा था इनमें, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र थे। लेकिन यहां पर लिखित जानकारी नहीं है तो हम यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते हैं कि यहां पर यह चार वर्ण थे या अलग थे। लेकिन यहां के स्थलों के खुदाई से यह देखा गया है, कि जितने भी नगरे थे वह दो भागों में बैठे हुए थे। पहला भाग उच्च नगर होता था तो दूसरा निम्न नगर होता था। जो उच्च नगर होते तो उनमें बड़े-बड़े घर थे। तो वह विशेष रूप से धनी लोगों के लिए होगा। जो निम्न नगर था उसमें गरीब रहते थे। तो इतना तो तय है कि यहां 2 वर्ग के लोग थे, एक धनी वर्ग और दूसरा गरीब।
सामाजिक क्रिया में समाज कितने वर्गों में बांटा था? क्योंकि हम लोग वैदिक काल से पड़ेंगे तो हमें यह नजर आएगा कि, समाज चार वर्णो बंटा था इनमें, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र थे। लेकिन यहां पर लिखित जानकारी नहीं है तो हम यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते हैं कि यहां पर यह चार वर्ण थे या अलग थे। लेकिन यहां के स्थलों के खुदाई से यह देखा गया है, कि जितने भी नगरे थे वह दो भागों में बैठे हुए थे। पहला भाग उच्च नगर होता था तो दूसरा निम्न नगर होता था। जो उच्च नगर होते तो उनमें बड़े-बड़े घर थे। तो वह विशेष रूप से धनी लोगों के लिए होगा। जो निम्न नगर था उसमें गरीब रहते थे। तो इतना तो तय है कि यहां 2 वर्ग के लोग थे, एक धनी वर्ग और दूसरा गरीब।
सांस्कृतिक :
यहां के लोगों को लिपि का ज्ञान था, इन्हें माप तोल का ज्ञान था, मूर्तिकला का ज्ञान था, बर्तन निर्माण कला का ज्ञान था, धातु कला का ज्ञान था।
यहां के लोगों को लिपि का ज्ञान था, इन्हें माप तोल का ज्ञान था, मूर्तिकला का ज्ञान था, बर्तन निर्माण कला का ज्ञान था, धातु कला का ज्ञान था।
सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार :
सिंधू घाटी सभ्यता का विस्तार भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में लगभग 13,00000 वर्ग किलोमीटर में फैला था और धीरे-धीरे इसके स्थल जैसे-जैसे बढ़ते जा रहे हैं इनका आकार भी बढ़ता जा रहा है।
सिंधु घाटी सभ्यता मुख्य रूप से नीचे दिए गए स्थानों पर स्थित थी,
1.आलमगीरपुर ( उत्तर प्रदेश) - हिंडन नदी के किनारे
2.दायमाबाद (महाराष्ट्र) - गोदावरी नदी के सहयोगी नदियों के किनारे
3.माँदा (जम्मू-कश्मीर) - चिनाब नदी के किनारे
4.सुत्कागेडोर (बलूचिस्तान) - दास्क नदी के किनारे
यह चार स्थान इसके सीमा रेखा का निर्धारण करते हैं। यह सभ्यता पूरब से पश्चिम की ओर लगभग 1600 किमी में फैली है, जबकि उत्तर से दक्षिण की ओर लगभग 1400 किमी में फैली हैं।
1.आलमगीरपुर ( उत्तर प्रदेश) - हिंडन नदी के किनारे
2.दायमाबाद (महाराष्ट्र) - गोदावरी नदी के सहयोगी नदियों के किनारे
3.माँदा (जम्मू-कश्मीर) - चिनाब नदी के किनारे
4.सुत्कागेडोर (बलूचिस्तान) - दास्क नदी के किनारे
यह चार स्थान इसके सीमा रेखा का निर्धारण करते हैं। यह सभ्यता पूरब से पश्चिम की ओर लगभग 1600 किमी में फैली है, जबकि उत्तर से दक्षिण की ओर लगभग 1400 किमी में फैली हैं।
इस सभ्यता के जो स्थल खोजे गए हैं वह तीन देशों में प्राप्त होते हैं, जो है भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान।
स्वतंत्रता से पहले जब इसकी खुदाई शुरू हुई तब मात्र इसके 40-50 स्थल ही मिले थे। वर्तमान में इसके लगभग 1500 स्थल खोजे जा चुके हैं। जिसमें सबसे अधिक 900 से अधिक स्थल भारत में और बाकी बचे हुए पाकिस्तान और मात्र दो स्थल अफगानिस्तान में खोजे गए हैं। अगर भारत की ही बात करें तो अभी तक खोजे गए सभी स्थलों में सबसे ज्यादा स्थल गुजरात राज्य में खोजे गए हैं।

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